जैन धर्म के मूल सिद्धान्त जो जीवन को सार्थक बनाते हैं
सम्यक् ज्ञान
सत्य और धर्म के मार्ग को जानना ही मोक्ष की पहली सीढ़ी है।
सम्यक् दर्शन
सही श्रद्धा और विश्वास से आत्मा का उत्थान होता है।
सम्यक् चारित्र
सदाचार और संयम से जीवन को पवित्र बनाएं।
चातुर्मास यात्रा प्रभाव
भारत भर में 50+ चातुर्मास
प्रवचन, साधना और सेवा के माध्यम से शहरों, श्रद्धालुओं और समाज को जोड़ती एक सतत आध्यात्मिक यात्रा।
50+
पावन चातुर्मास
10
राज्य
50
शहर
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सीकरवर्तमान चातुर्मास शहर
+49अन्य शहर
आचार्य श्री के सान्निध्य में आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग
आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज के मार्गदर्शन में जैन धर्म के सिद्धान्तों को जीवन में उतारें। अहिंसा, सत्य और तपस्या के माध्यम से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करें।
धर्म प्रवचन एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन
जैन संस्कृति एवं परम्पराओं का संरक्षण
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वर्षों की तपस्या
जैन जीवन शैली
आत्मकल्याण के चार स्तम्भ
मार्ग 01
अहिंसा
मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट न देना ही परम धर्म है।
01
मार्ग 02
सत्य
सत्य वचन बोलना और सत्य आचरण करना जैन धर्म का मूल सिद्धान्त है।
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मार्ग 03
अपरिग्रह
आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना और त्याग की भावना रखना।
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मार्ग 04
तपस्या
आत्मशुद्धि के लिए तप, ध्यान और संयम का अभ्यास करना।
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सेवा एवं दान
दान धर्म का मूल है — जीव दया ही सबसे बड़ा पुण्य
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